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शब्दकोश

पितृ दोष (Pitra dosha)

सूर्य और नवम भाव की पीड़ा, जिसे परंपरा में पितृ-पक्ष का अधूरा ऋण माना जाता है।

इसका अर्थ

नवम भाव पिता, वंश और धर्म का वहन करता है और सूर्य पितृ-तत्व का - अतः पितृ दोष इन्हीं दोनों की क्षति से परिभाषित होता है। सामान्य कारण हैं सूर्य की राहु, केतु या शनि से युति, नवम भाव में राहु-केतु, अथवा नवमेश का दुःस्थान में गिरना।

इसे कैसे पढ़ा जाता है

एस्ट्रोनिक इसे हाँ/नहीं में नहीं, अंकों में बताता है, क्योंकि शास्त्रीय स्रोत इन स्थितियों को भिन्न भार देते हैं और जिस कुंडली में एक मंद नियम बने वह उससे भिन्न है जिसमें चार बनें। अंक, सीमा और कौन-सा नियम बना - तीनों दिखाए जाते हैं।

किन बातों का ध्यान रखें

यह किसी के आचरण के विषय में कुछ नहीं कहता और न ही परिवार में घटी किसी बात का निदान है। यह सामान्य भी है। ईमानदार पठन यही है कि ये पिता और उत्तराधिकार के भावों की पीड़ाएँ हैं, जो व्यवहार में ऐसी कुंडली दर्शाती हैं जहाँ अधिकार और विरासत में मिली अपेक्षा जीवंत विषय हैं।

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