इसका अर्थ
वक्रता आभासी गति है, वास्तविक नहीं: यह तब होती है जब पृथ्वी और कोई अन्य ग्रह एक-दूसरे से आगे निकलते हैं और बाहरी पिंड नक्षत्रों की पृष्ठभूमि में पीछे खिसकता दिखता है। बुध, शुक्र, मंगल, गुरु और शनि समय-समय पर वक्री होते हैं। सूर्य और चंद्र कभी नहीं; राहु-केतु परिभाषा से सदा वक्री हैं।
इसे कैसे पढ़ा जाता है
वैदिक और पश्चिमी परंपराएँ इसे भिन्न रूप से पढ़ती हैं। पश्चिमी परंपरा इसे प्रायः निर्बलता या अंतर्मुखता मानती है। कई शास्त्रीय वैदिक स्रोत वक्री ग्रह को असाधारण रूप से बलवान मानते हैं - षड्बल का चेष्टा बल वक्रता के निकट ही सर्वाधिक होता है।
किन बातों का ध्यान रखें
'बुध वक्री' को तकनीक और यात्रा के बिगड़ने का काल मानना आधुनिक पश्चिमी धारणा है, जिसका कोई शास्त्रीय वैदिक आधार नहीं और न ही कोई स्थापित प्रमाण।
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