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केपी कुंडली (कृष्णमूर्ति पद्धति)

अपना लग्न, बारह प्लासिडस भाव-संधियाँ और हर ग्रह — प्रत्येक का पूरा राशि → नक्षत्र → उप → उप-उप स्वामी क्रम, जिस पर केपी की सारी पढ़त टिकी है।

समय पता नहीं? खाली छोड़ दें — हम दोपहर 12 बजे के अनुसार कुंडली पढ़ेंगे।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केपी ज्योतिष क्या है?
कृष्णमूर्ति पद्धति — के॰ एस॰ कृष्णमूर्ति द्वारा 1970 के दशक के आरंभ में 'के॰पी॰ रीडर' श्रृंखला में प्रस्तुत की गई एक आधुनिक निरयण पद्धति। यह पारंपरिक वैदिक ज्योतिष से तीन बातों में अलग है: इसका अपना अयनांश (केपी-न्यूकॉम्ब), भावों के लिए प्लासिडस संधियाँ, और सबसे मुख्य — उपस्वामी, जो इसकी अपनी देन है।
उपस्वामी (सब-लॉर्ड) क्या होता है?
राशि 30° की होती है और नक्षत्र 13°20' का। कृष्णमूर्ति ने हर नक्षत्र को आगे नौ भागों में बाँटा, और वह भी विंशोत्तरी दशा के वर्षों के अनुपात में — इसलिए ये नौ भाग असमान हैं। जिस भाग में कोई बिंदु पड़ता है, उसका स्वामी ही उस बिंदु का उपस्वामी है। शुक्र का उप 2°13'20" चौड़ा है और सूर्य का केवल 40', इसलिए एक डिग्री के भीतर की दूरी भी उपस्वामी बदल सकती है।
भाव-संधि का उपस्वामी इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
केपी की मूल मान्यता यही है कि किसी भाव का फल उसकी संधि के उपस्वामी से तय होता है — राशि या नक्षत्र के स्वामी से नहीं, जो केवल पृष्ठभूमि बताते हैं। इसलिए केपी में प्रश्न पहले भावों से जोड़ा जाता है, फिर उन भावों की संधियों के उपस्वामी देखे जाते हैं। यह मान्यता इसी पद्धति की है; अन्य परंपराएँ भाव को दूसरे ढंग से पढ़ती हैं।
यह कुंडली मेरी सामान्य कुंडली से अलग क्यों दिख रही है?
क्योंकि गणना का आधार ही अलग है। केपी कृष्णमूर्ति अयनांश और प्लासिडस भाव पद्धति लेती है, जबकि इस साइट के अन्य टूल लाहिड़ी अयनांश और पूर्ण-राशि भाव पद्धति पर चलते हैं। अयनांश का अंतर कुछ कलाओं का है, पर प्लासिडस संधियाँ राशि के आरंभ पर नहीं पड़तीं — इसलिए ग्रह का भाव बदल सकता है, और संधि के निकट होने पर राशि भी। दोनों में से कोई गलत नहीं; वे अलग पद्धतियाँ हैं।
क्या इसके लिए सही जन्म समय ज़रूरी है?
यहाँ सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। लग्न लगभग हर चार मिनट में एक अंश आगे बढ़ता है, और उपस्वामी की सीमाएँ कुछ ही कलाओं की चौड़ी होती हैं — इसलिए कुछ मिनट का अंतर भी लग्न और भाव-संधियों के उपस्वामी बदल सकता है। समय न होने पर हम दोपहर 12 बजे से गणना करते हैं; तब ग्रहों की राशि और नक्षत्र तो लगभग सही रहेंगे, पर संधियों के उपस्वामी भरोसे लायक नहीं होंगे।