इसका अर्थ
राज योग तब बनता है जब केंद्र (1, 4, 7, 10) का स्वामी और त्रिकोण (1, 5, 9) का स्वामी आपस में जुड़ें — युति से, परस्पर दृष्टि से, या राशि-परिवर्तन से। तर्क यह है कि कुंडली के स्तंभ और उसके शुभ त्रिकोण एक ही दिशा में खिंच रहे हैं।
इसे कैसे पढ़ा जाता है
नाम का अर्थ 'राजा जैसा योग' है, और कठिनाई यहीं से आरंभ होती है। बारहों लग्नों में कई केंद्रेश और त्रिकोणेश होते हैं, इसलिए किसी न किसी रूप का राज योग बड़ी संख्या में कुंडलियों में मिल जाता है; कुछ लग्नों में तो यह लगभग स्वतः बनता है क्योंकि एक ही ग्रह केंद्र और त्रिकोण दोनों का स्वामी होता है।
किन बातों का ध्यान रखें
योग बनना और फल देना दो अलग प्रश्न हैं। इसमें सम्मिलित ग्रहों का बलवान और अपीड़ित होना आवश्यक है, और उनकी दशा जीवन में आनी भी चाहिए। दो नीच ग्रहों से बना राज योग, जिनकी दशा अस्सी वर्ष की आयु में आए, योग तो वास्तविक है किंतु आश्वासन क्षीण।